वह यह कि निराशा के इस माहौल में एक दीप ही हमें अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जा सकता है वही सामूहिक रूप से अंधेरे को उजाले में बदल देने की ताकत हमें सकारात्मक चिंतन की ओर ले जाती है ।
संक्रमण से गुजर रहे लोगों में जीने की आशा हैं और वो इस लड़ाई से पूरी शिद्दत के साथ लड़ भी रहे हैं और ठीक होकर घर आ भी रहे हैं।
संक्रमित लोगों में आशा की किरण जगाने के लिये इस तरह की रौशनी की बेहद आवश्यकता थी।
ठीक वैसे ही जैसे असाध्य बीमारी हो जाने पर परिवार जन कहते हैं कोई बात नहीं जल्द ही ठीक हो जाओगे।
बस वो आशा के दो शब्द ही हमें जीने के लिये प्रेरित करते हैं।
वही दुसरी तरफ
जो लोग कोरोना योद्धा बनकर दिन-रात जुटे हैं उनके परिवार को भी हमारे समर्थन की आवश्यकता है ।
बहुत से कोरोना योद्धाओं ने अपने परिवार जनों से ना मुलाकात की होगी ना ज्यादा बात की होगी, मरीजों की देखभाल और उनकी सास हाल में ही उनका ज्यादा समय बीत रहा होगा।
यह उस जंग जैसा है जिसमें हमें पता नहीं की कब कहां से हम एक नई चुनौती मिल जाए?
भारत ने हमेशा ही संकट में विश्व को रास्ता दिखाया है और एक बार पुणे भारत अन्य देशों के लिए एके प्रेरक सिद्ध हुआ है।
भारत ही नहीं वरन कोरोना से जूझ रहे अनेक देशों में इस तरीके के दीपों उत्सव आयोजित कर कोरोना योद्धाओं का हौंसला बढ़ाने का प्रयास किया।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि तिब्बत एक राष्ट्र था जिस पर 1959 में चीन ने कब्जा कर लिया और आज तिब्बत समुदाय के लोग दुनिया भर में शरणार्थियों के रूप में रह रहे हैं इसके बाद भी तिब्बती समुदाय में जीने के लिए आशा है और वह अपने देश की आजादी के लिए भी प्रयास कर रहे हैं और चीन जैसी मां शक्ति से लड़ रहे हैं फर्क सिर्फ इतना है यह चाइना वायरस जीवन छीन रहा है और उस चाइना वायरस ने तिब्बत के लोगों की आजादी छीन ली थी ।
भारत के लोगों ने देखा और यह किया भी कि बिना चाइनीज लड़ियों के भी वह दीपावली मना सकते हैं। अप्रैल के महीने में दीपावली मनाई गई यह दिवाली एक ऐतिहासिक घटना थी।